Bangladesh politics: खालिदा जिया का प्रस्थान, तारिक रहमान का आगमन!

Wed, Dec 31 , 2025, 08:30 AM

Source : Hamara Mahanagar Desk

नयी दिल्ली: बंगलादेश की राजनीति में चालीस से अधिक वर्षों तक प्रमुख व्यक्तित्व रहीं बेगम खालिदा जिया ने एक साधारण गृहिणी से देश की पहली महिला प्रधानमंत्री तक का शानदार सफर तय किया और दक्षिण एशिया के इतिहास में सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक के रूप में अपना लोहा मनवाया।

उनका राजनीतिक करियर सैन्य शासन, जन आंदोलनों, चुनावी राजनीति और लंबे कानूनी और राजनीतिक गतिरोधों के बीच आकार लेता गया। अपनी कॉलेज की पढ़ाई के दौरान 1960 में उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी सेना के अधिकारी जियाउर रहमान से शादी की।

पाकिस्तानी सेना ने दो जुलाई, 1971 को खालिदा जिया और उनके दो बेटों को ढाका के एक घर से हिरासत में लेकर ढाका छावनी में कैद कर दिया था, जहाँ वह बंगलादेश की आजादी से एक दिन पहले तक, यानि 15 दिसंबर तक कैद में रहीं।

बंगलादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति और बेगम जिया के पति जियाउर रहमान की 1981 में हत्या के बाद, बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के आग्रह पर बेगम जिया ने पार्टी में नेतृत्व की भूमिका संभाली। बिना किसी पूर्व राजनीतिक अनुभव के, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्द ही विपक्षी राजनीति में एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरीं।

बेगम जिया ने सात-दलीय गठबंधन के गठन का नेतृत्व किया और जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद के सैन्य शासन के खिलाफ एक निरंतर आंदोलन चलाया। यह आंदोलन 1986 तक विभिन्न चरणों में जारी रहा और बाद में इरशाद के इस्तीफे की मांग के साथ 'एक-सूत्रीय आंदोलन' में बदल गया। खालिदा जिया के अडिग रुख और इस आंदोलन ने अंततः इरशाद के पतन में योगदान दिया और संसदीय लोकतंत्र की बहाली का रास्ता साफ किया।

बीएनपी के 1991 में संसदीय चुनाव जीतने के बाद खालिदा जिया पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, जो लोकतांत्रिक शासन की वापसी का प्रतीक था। वह 15 फरवरी, 1996 को कुछ समय के लिए फिर से निर्वाचित हुईं और बाद में 2001 में एक गठबंधन सरकार के माध्यम से तीसरे कार्यकाल के लिए सत्ता में लौटीं। उन्होंने पांच आम चुनावों में 23 संसदीय सीटों पर चुनाव लड़ा और उन सभी में जीत हासिल की। यह एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिसे बंगलादेश के चुनावी इतिहास में अद्वितीय माना जाता है।

बंगलादेश के मामलों के विशेषज्ञों और पर्यवेक्षकों के अनुसार, बेगम जिया के निधन से 12 फरवरी, 2026 को होने वाले आगामी चुनावों में बीएनपी के पक्ष में सहानुभूति की एक बड़ी लहर देखने को मिल सकती है। सभी ने देखा कि लंदन में 17 साल के स्वनिर्वासन के बाद 25 दिसंबर को जब खालिदा जिया के बेटे और पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान ढाका पहुंचे, तो उनका भव्य स्वागत किया गया। ये दोनों कारक बीएनपी की चुनावी संभावनाओं को और मजबूत कर सकते हैं।

इससे चुनावों में 'जमात-ए-इस्लामी' के बेहतर प्रदर्शन की संभावनाओं के काफी हद तक कम होने के भी आसार हैं। दूसरे शब्दों में, चुनावों में बीएनपी विपक्षियों का सूपड़ा साफ कर सकती है। तारिक रहमान और बीएनपी के कार्यकर्ता बेगम खालिदा जिया के निधन से उपजी सहानुभूति को वोटों में बदलने और पूर्ण जीत सुनिश्चित करने के लिए अपने चुनाव अभियान में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

यह अवामी लीग को और भी अलग-थलग कर सकता है, जो पिछले साल अगस्त में शेख हसीना के बंगलादेश से बाहर जाने के बाद से ही हाशिए पर नजर आ रही है। हालांकि, बंगलादेश में किसी भी राजनीतिक दल के अंत की भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी।

यदि चुनाव में बीएनपी सत्ता में लौटती है, तो तारिक रहमान ही एकमात्र संभावित 'प्रधानमंत्री पद के दावेदार' हैं। लगभग दो दशकों तक अज्ञातवास में रहने के बाद, वह अपने पिता जियाउर रहमान और अपनी माता के दो कार्यकाल की भूमिकाओं को फिर से परिभाषित कर अपनी अनुपस्थिति की भरपाई करना चाहेंगे।

तारिक रहमान और उनके सहयोगी स्वतंत्रता संग्राम में जियाउर रहमान की भूमिका पर जोर देते हुए इतिहास के साथ एक नया प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, जिसमें उनकी की भूमिका को और अधिक प्रमुखता से उभारा जाएगा ताकि इतिहास में उन्हें वह स्थायी स्थान मिल सके जो पिछले बीस वर्षों में धुंधला पड़ता दिख रहा था।

इतिहास की इस नई परिभाषा में जियाउर रहमान और खालिदा के महिमामंडन के बीच, मुक्ति संग्राम के अन्य नायक और शहीद धीरे-धीरे ओझल हो सकते हैं। बीएनपी शायद यही उम्मीद करेगी।

हालांकि, श्री तारिक और बीएनपी की प्राथमिकता सबसे पहले खराब कानून-व्यवस्था की स्थिति को सुधारना, सुरक्षा बलों के गिरते मनोबल को बढ़ाना और सबसे महत्वपूर्ण बात अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करनी होनी चाहिए, जो वर्तमान में धार्मिक चरमपंथियों के आतंक से खतरे में हैं।

तारिक के लिए यह भी अच्छा होगा कि वे अपने चुनावी भाषणों में इन प्राथमिकताओं को प्रमुखता से उठाएं ताकि पिछले एक साल से अधिक समय से अंतरिम सरकार के कार्यकाल में असुरक्षा की भावना के बीच रह रहे आम लोगों में विश्वास जगाया जा सके।

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