ऊखीमठ। उत्तराखंड में सोशल मीडिया (social media) पर भगवान शिव के ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग केदारनाथ धाम की रूप छड़ी (Roop Chhadi) और मुकुट के गायब होने का भ्रम मंगलवार को धाम के रावल भीमाशंकर (Lord Shiva) लिंग के स्पष्टीकरण के बाद समाप्त हो गया, जबकि इससे पहले विधानसभा सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में राज्य के धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने प्रकरण की जांच का आश्वासन दिया।
धाम के रावल ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि केदारनाथ धाम की परंपराएं प्राचीन काल से चली आ रही है और इसे लेकर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। उन्होंने बताया कि वीरशैव लिंगायत धर्म में पांच प्रमुख प्राचीन पीठ हैं। रामभपुरी, उज्जैनी, केदार, श्रीशैल और काशी इन पांचों पीठों का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि केदार पीठ ऊखीमठ वैराग्य पीठ है, जो चार युगों से चली आ रही परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने बताया कि परंपरा के अनुसार धर्म प्रचार के लिए रावल को रूप छड़ी, मुकुट और अन्य धार्मिक सामग्री अपने साथ ले जाने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि कपाट बंद होने के बाद शीतकाल में उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में मुकुट धारण की परंपरा निभाई जाती है। इसी परंपरा के तहत वे धार्मिक कार्यक्रमों में रूप छड़ी और मुकुट के साथ शामिल होते रहे हैं। रावल ने बताया कि इसी परंपरा के तहत वर्ष 2016 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में भी वे रूप छड़ी और मुकुट के साथ शामिल हुए थे। इसी क्रम में इस वर्ष भी पांच से 12 फरवरी तक नांदेड़ में आयोजित शिव कथा और विश्व शांति यज्ञ कार्यक्रम में वे इन धार्मिक प्रतीकों के साथ सम्मिलित हुए थे। उन्होंने कहा कि फरवरी माह में रूप छड़ी की विधिवत साधना की गई और बाद में इसे नियमानुसार जमा कर दिया गया है। इसलि



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