Digital Revolution: बस्तर के वनांचलों में डिजिटल क्रांति, घर पहुंच बैंकिंग सुविधा दे रही हैं बीसी सखियां!

Tue, Mar 17 , 2026, 05:38 PM

Source : Uni India

जगदलपुर : छत्तीसगढ में बस्तर के वनांचलों में वह मंजर आज भी की यादों में एक कसक पैदा कर देता है, जब एक लाचार बुजुर्ग (Helpless Elderly) को अपनी चंद रुपयों की पेंशन के लिए तपती धूप में मीलों पैदल चलना पड़ता था। कभी शारीरिक अक्षमता तो कभी तंगहाली के कारण बैंक (bank) तक न पहुंच पाने का वह दर्द और थक-हारकर सूनी आंखों से लौट आने की वह बेबसी ग्रामीण जीवन का एक कड़वा सच थी। लेकिन वक्त बदला और बस्तर की इन पथरीली राहों पर ममता और सेवा का हाथ बढ़ाते हुए बीसी सखियों ने उस करुणा को शक्ति में बदल दिया है। आज वही बुजुर्ग अपनी देहरी पर बैठी बैंक सखी को देख मुस्करा उठता है, क्योंकि अब बैंक चलकर उसके घर तक आता है।

जिला पीआरओ से आज मिली जानकारी के अनुसार, ग्रामीण बैंकिंग के इस मानवीय चेहरे का सबसे जीवंत उदाहरण छिदगांव में देखने को मिलता है, जहां के वृद्ध हितग्राही रतन राम बघेल वृद्धावस्था के कारण चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं। ऐसे में बीसी सखी दशोमती कश्यप हर माह उनके घर जाकर पेंशन की राशि उनके हाथों में सौंपती हैं। अपनी इस सुविधा पर खुशी जाहिर करते हुए रतन राम बघेल कहते हैं, "बढ़ती उम्र और शारीरिक कमजोरी के कारण मेरे लिए बैंक तक जाना अब संभव नहीं रह गया था। पेंशन के पैसों के लिए हमेशा दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब दशोमती बेटी हर महीने घर आकर पैसे दे जाती है, जिससे मुझे बहुत सहारा मिला है।"

बैंक और ग्रामीणों के बीच एक मजबूत कड़ी बनकर उभरीं जिले की इन 144 बीसी सखियों ने फरवरी 2026 में 4 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय लेन-देन कर यह साबित कर दिया है कि यदि महिलाओं को अवसर और तकनीक मिले, तो वे पूरी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती हैं। इन बैंक सखियों ने न केवल बैंकिंग सेवाओं को सुलभ बनाया है, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई है। विशेष रूप से प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के तहत 67 लाख रुपये से अधिक की राशि गर्भवती और धात्री माताओं तक पहुंचाकर इन सखियों ने स्वास्थ्य और पोषण की दिशा में भी बड़ा योगदान दिया है। इसके साथ ही बुजुर्गों की वृद्धावस्था पेंशन और महात्मा गांधी नरेगा मजदूरों की मजदूरी का भुगतान भी अब इन्हीं बैंक सखियों के माध्यम से गांव में ही सुरक्षित तरीके से हो रहा है।

बीसी सखी दशोमती कश्यप बताती हैं, "पहले लोगों को पैसे निकालने के लिए शहर जाना पड़ता था, जिसमें उनका पूरा दिन खराब हो जाता था और आने-जाने का खर्च भी अलग से होता था। अब हम गांव में ही उनके पैसे निकाल कर दे देते हैं। बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे ज्यादा सुविधा हुई है।" महिला सशक्तिकरण का यह सुंदर उदाहरण दरभा, बस्तर, लोहंडीगुड़ा और तोकापाल सहित जिले के सभी विकासखंडों में देखने को मिल रहा है, जहां इन बैंक सखियों ने हजारों लेन-देन कर लाखों रुपयों का प्रबंधन किया है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि उन 144 महिला शक्तियों के आत्मविश्वास की कहानी है, जो अब खुद आत्मनिर्भर हैं और अपने गांव के विकास का नेतृत्व कर रही हैं। बस्तर की इन बेटियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल इंडिया का असली चेहरा गांवों की ये सशक्त बीसी सखियां ही हैं। जिला प्रशासन के अनुसार, इन सखियों के प्रयासों से न केवल बैंकिंग सेवाओं का विस्तार हुआ है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है और आने वाले समय में इनकी संख्या और भूमिका दोनों में और इजाफा होने की संभावना है।

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