नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (Prevention of Atrocities) अधिनियम के तहत एक आरोपी के खिलाफ सोमवार को आपराधिक कार्यवाही को दरकिनार करते हुए कहा कि 'अस्पष्ट आरोप' (vague allegations) और घटनास्थल पर मौजूदगी किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिये पर्याप्त नहीं हैं।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले पटना उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप से मना करते हुए मामले को संज्ञान में लिया था और भागलपुर जिले से आरोपी को तलब किया था। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया कि कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा सिर्फ इसलिये नहीं लागू हो जातीं कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का सदस्य है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने यह भी कहा कि आरोपी को उस व्यक्ति की जातीय स्थिति पता होने से भी यह कानून लागू नहीं होता।
पीठ ने कहा कि न तो प्राथमिकी में और न ही आरोपपत्र में ऐसा कुछ है जिसके आधार पर कहा जा सके कि आरोपी ने जाति-आधारित गाली दी हो या कोई ऐसा कृत्य किया हो। ये आरोप आम थे और अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने के लिये नाकाफ़ी थे। उच्चतम न्यायालय ने कहा, "सिर्फ़ घटनास्थल पर मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि किसी अपराध को करने में हिस्सा लिया गया हो।" शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में मुकदमा जारी रखना "न्याय का मज़ाक" ( travesty of justice) होगा। यह अपील पटना उच्च न्यायालय के 15 फरवरी, 2025 के एक आदेश को चुनौती दे रही थी, जिसमें एक प्राथमिकी से शुरू हुई कार्यवाही को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी गयी थी। इस प्राथमिकी में अपीलकर्ता पर एक आंगनवाड़ी केंद्र में जाति के आधार पर गाली-गलौज और मारपीट का आरोप लगाया गया था।



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Mon, Jan 19 , 2026, 10:47 PM