हरीश पर्वतानेनी ने 'धर्म के राजनीतिकरण' के खिलाफ वैश्विक समुदाय को एकजूट होने का आह्वान किया

Tue, Mar 17 , 2026, 04:14 PM

Source : Uni India

न्यूयॉर्क:  संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि (India's Permanent Representative) हरीश पर्वतानेनी (Harish Parvathaneni) ने मंगलवार को धर्म के राजनीतिकरण और आस्था को हथियार बनाने के बढ़ते खतरों के खिलाफ वैश्विक सतर्कता का आह्वान किया। पर्वतानेनी इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और 'यूनाइटेड नेशंस अलायंस ऑफ सिविलाइजेशन (United Nations Alliance of Civilizations)' द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'इंटरनेशनल डे टू कॉम्बैट इस्लामोफोबिया' को संबोधित कर रहे थे। राजदूत ने 'इस्लामोफोबिया के नैरेटिव (narrative of Islamophobia)' का उपयोग करने के लिए पाकिस्तान पर परोक्ष रूप से निशाना साधा और कहा कि संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए आस्था का उपयोग करना चिंताजनक है।

 पर्वतानेनी ने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक पहचान के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "संयुक्त राष्ट्र के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह धार्मिक पहचान को हथियार बनाने और इसे संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति और खतरों पर ध्यान दे, चाहे वह सरकारी पक्ष की तरफ से हो या गैर-सरकारी पक्ष की ओर से। भारत का पश्चिमी पड़ोसी अपने पड़ोस में इस्लामोफोबिया की काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।"

राजदूत ने सभा से पड़ोसी देश के मानवाधिकार रिकॉर्ड का मूल्यांकन करने का आग्रह किया और सवाल उठाया कि अहमदिया समुदाय के व्यवस्थित दमन और अफगान शरणार्थियों की जबरन वापसी को कैसे उचित ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा, "कोई आश्चर्य कर सकता है कि इस देश में अहमदिया समुदाय के क्रूर दमन, या असहाय अफगानों की बड़े पैमाने पर वापसी या रमजान के इस पवित्र महीने में हवाई बमबारी अभियानों को क्या कहा जाएगा?" राजदूत ने चुनिंदा नैरेटिव (विमर्श) के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा, "इतिहास इस बात का गवाह है कि धर्म का राजनीतिकरण शिकायतों का समाधान नहीं करता है। 

हम ऐसे ढांचे के खिलाफ सावधानी बरतने का आग्रह करते हैं जो केवल एक ही आस्था पर ध्यान केंद्रित करते हैं, बिना इसके सभी रूपों में 'रिलिजियोफोबिया' (धर्म के प्रति डर) को संबोधित किए। पर्वतानेनी ने धर्म या विश्वास के आधार पर असहिष्णुता और भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर 1981 के संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र को एक 'संतुलित और स्थायी साधन' बताया जो 'किसी को विशेषाधिकार दिए बिना सभी धार्मिक अनुयायियों के अधिकारों की रक्षा करता है।' राजदूत ने भारत की बहुलवादी विरासत और धर्मनिरपेक्षता के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालते हुए जोर दिया कि धार्मिक भेदभाव के चुनिंदा नैरेटिव सह-अस्तित्व और शांति के सिद्धांतों को कमजोर करते हैं। उन्होंने कहा, "मेरा प्रतिनिधिमंडल धर्म के नाम पर हिंसा और नफरत की कड़ी निंदा करता है, चाहे वह कोई भी धर्म हो।"

 पर्वतानेनी ने कहा, एक ऐसे राष्ट्र के रूप में जिसने हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म जैसे दुनिया के चार प्रमुख धर्मों को जन्म दिया है, भारत धार्मिक भेदभाव से मुक्त दुनिया की आवश्यकता से पूरी तरह अवगत है। उन्होंने भारतीय दर्शन 'सर्व धर्म समभाव' का उल्लेख किया और देश के सभ्यतागत लोकाचार और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता पर प्रकाश डाला। संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर राजदूत ने जोर देते हुए कहा, "शांति और मानवीय गरिमा के लिए संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा योगदान अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के प्रयासों में और सार्वभौमिक मानवाधिकारों को बढ़ावा देने में है।"

 पर्वतानेनी ने धार्मिक स्वतंत्रता पर भारत के रिकॉर्ड का बचाव करते हुए कहा, "जम्मू-कश्मीर सहित भारत में मुस्लिम अपने लिए बोलने के लिए अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनते हैं। यहाँ एकमात्र 'फोबिया' (डर) उस बहुसांस्कृतिक और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के खिलाफ दिखाई देता है जिसका भारत में सभी समुदाय आनंद लेते हैं। राजदूत ने 'सभी रूपों में धार्मिक घृणा और हिंसा से मुक्त दुनिया' के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से आग्रह किया कि वह 'अपना समय और सीमित संसाधन हर आस्था के हर व्यक्ति के लिए समानता, गरिमा और कानून के शासन पर आधारित समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में लगाए।'

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