मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने 2014 में मुस्लिम समुदाय के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए सरकारी और अर्ध-सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के साथ-साथ शैक्षिक संस्थानों में दाखिले में घोषित पांच प्रतिशत आरक्षण को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है। यह फैसला सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग द्वारा मंगलवार देर रात जारी एक सरकारी प्रस्ताव के ज़रिए आधिकारिक रूप से वापस लिया गया।
नए प्रस्ताव में विशेष पिछड़ा श्रेणी ए (एसबीसी -ए) के तहत शुरू किये गये कोटे से जुड़े पहले के सभी सरकारी ऑर्डर, सर्कुलर और प्रशासनिक फैसलों को रद्द कर दिया गया है। इसमें अधिकारियों को इन वर्गाें के लोगों को जाति प्रमाणपत्र और जाति मान्यता प्रमाणपत्र जारी करना तुरंत बंद करने का भी निर्देश दिया गया है, जिन्हें पहले इस वर्गीकरण के तहत योग्य माना गया था।
प्रस्ताव के अनुसार, जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) सरकार द्वारा महाराष्ट्र अध्यादेश संख्या 14 ,2014 के ज़रिए शुरू किया गया कोटा अब कानूनी तौर पर मान्य नहीं है। राज्य विधानसभा ने ज़रूरी छह महीने के समय में अध्यादेश को कानून में नहीं बदला और इसलिए यह 23 दिसंबर, 2014 को अपने आप निरस्त हो गया। इसके निरस्त होने से पहले, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 14 नवंबर, 2014 को अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसमें खास तौर पर सरकारी नौकरियों में इसके लागू होने पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद, उच्चतम न्यायालय ने भी इससे जुड़ी कार्रवाई में इसके पहलुओं को अलग रखा।
वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कार्रवाई कोई नया नीतिगत फैसला नहीं है, बल्कि इसका मकसद एक प्रशासनिक सुधार है। नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया, "न्यायालय के दखल और अध्यादेश के निरस्त होने की वजह से कोटा कभी लागू नहीं हुआ।" अधिकारी ने कहा कि नया प्रस्ताव सिर्फ आधिकारिक रिकॉर्ड को मौजूदा कानूनी स्थिति के साथ जोड़ता है और उन नियमों के तहत आगे किसी भी प्रशासनिक कदम को रोकता है जिनकी मान्यता पहले ही खत्म हो चुकी है।
वर्ष 2014 के अध्यादेश ने कुछ मुस्लिम समूहों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा बताया था और विभाग को सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया था ताकि लाभार्थी सीधी भर्ती और शैक्षिक संस्थानों में दाखिले में आरक्षण का दावा कर सकें। लेकिन उच्च न्यायालय के अंतरिम स्थगन और उसके बाद अध्यादेश के निरस्त होने की वजह से यह कदम एक दशक से ज़्यादा समय तक कानूनी तौर पर अनसुलझा रहा और इसे कभी असल में लागू नहीं किया गया।
इस फैसले पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई है। बुधवार को कांग्रेस पार्टी ने इस कदम की कड़ी आलोचना की और इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर एक बड़ा झटका बताया। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा कि 2014 के आरक्षण को लागू करने के लिए अच्छे कदम उठाने के बजाय, सरकार ने उच्च न्यायालय के अंतरिम स्थगन और अध्यादेश के निरस्त होने का हवाला देकर पहले की प्रक्रिया को समाप्त करने का फैसला किया।
पार्टी ने महायुति सरकार पर अल्पसंख्यक कल्याण को कमज़ोर करने का भी आरोप लगाया और सवाल किया कि प्रशासन ने इस मामले को लंबे समय से चली आ रही कानूनी अनिश्चितता में जारी रखने के बजाय इस चरण पर पिछले सरकारी प्रस्तावों और सर्कुलर को औपचारिक रूप से रद्द करने का फैसला क्यों किया। विपक्ष के नेताओं ने यह भी चिंता जताई कि इस फैसले से हज़ारों छात्रों और नौकरी के इच्छुक लोगों पर असर पड़ सकता है, जिन्हें इस श्रेणी के तहत फायदा मिलने की उम्मीद थी। कुछ ज़िलों में, जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदनों पर विचार किया जा रहा था और अब इसके रद्द होने से उन आवेदकों पर असर पड़ सकता है।
सरकारी प्रस्ताव पर सामाजिक न्याय विभाग की उप सचिव वर्षा देशमुख के हस्ताक्षर हैं और यह पूरे राज्य में लागू है। इसमें सामान्य प्रशासन, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, और स्कूली शिक्षा समेत सभी संबंधित विभागों को 2014 के नियमों के आधार पर कोई भी कार्रवाई बंद करने का निर्देश दिया गया है। इस कदम को देवेंद्र फडणवीस की सरकार की आरक्षण से जुड़ी नीति को अदालत के फैसलों के अनुसार लाने की बड़ी कोशिश के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। इस मुद्दे से आने वाले चुनावों से पहले महाराष्ट्र में आरक्षण और अल्पसंख्यक कल्याण पर और राजनीतिक बहस छिड़ने की उम्मीद है।



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