काबुल। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क (High Commissioner Volker Turk) ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय (international community) से अफगानिस्तान में "लैंगिक नस्लीय भेदभाव" (Gender Racial Discrimination) को औपचारिक रूप से मान्यता देने की अपील की है। उनका कहना है कि तालिबान शासन के तहत महिलाओं को समाज में व्यवस्थित और संस्थागत प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है।
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को गुरुवार को संबोधित करते हुए श्री तुर्क ने कहा कि इस्लामी अमीरात द्वारा जारी हालिया फरमानों ने लैंगिक आधार पर बहिष्कार की ऐसी संरचना को मजबूत किया है, जो अफगानिस्तान के सार्वजनिक जीवन के लगभग हर पहलू को प्रभावित कर रही है। उन्होंने तर्क दिया कि इन उपायों का पैमाना और निरंतरता केवल अलग-अलग उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि यह उत्पीड़न की एक औपचारिक व्यवस्था का रूप ले चुके हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून (international law) के तहत कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए।
श्री तुर्क ने कहा कि " लैंगिक नस्लीय भेदभाव" की स्पष्ट परिभाषा और मजबूत जवाबदेही तंत्र आवश्यक हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया दे सके। उनके अनुसार, स्पष्टता के अभाव में अफगान महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के प्रयास बिखरे और अपर्याप्त रह सकते हैं। तालिबान ने 2021 में सत्ता में लौटने के बाद महिलाओं की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध लगाया है। कई क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित किए हैं और पुरुष अभिभावक की अनिवार्यता के जरिए आवाजाही पर सख्त नियंत्रण लगाये हैं।
इसके अलावा, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच और पहनावे के नियमों पर भी कठोर पाबंदियां लागू की गई हैं, जिससे महिलाएं लगभग पूरी तरह समाज से अलग-थलग हो गयी हैं। तुर्क ने चेतावनी दी कि इस प्रकार के संस्थागत भेदभाव से महिलाओं की घरेलू हिंसा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है, न्याय तक पहुंच सीमित हुई है और बच्चों के अधिकार भी प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव पर भी चिंता व्यक्त की और सीमा पार झड़पों में नागरिक हताहतों की खबरों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, क्षेत्रीय अस्थिरता अफगानिस्तान की पहले से ही नाजुक मानवीय स्थिति को और बिगाड़ सकती है। उन्होंने आगाह किया कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर निगरानी और ठोस कानूनी एवं कूटनीतिक कदम नहीं उठाए गए, तो प्रणालीगत उल्लंघन और गहराएंगे तथा लाखों अफगान महिलाएं और लड़कियां भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करती रहेंगी।



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