नयी दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी के विज्ञान भवन में सोमवार को "मोबाइल हेल्थ और टेलीमेडिसिन" विषय पर आईजीएसटीसी (भारत-जर्मन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र) रणनीतिक सम्मेलन 2026 का आयोजन किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य भारत-जर्मनी सहयोग के माध्यम से डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना और नवाचार को बढ़ावा देना था। इस सम्मेलन में नीति निर्माता, वैज्ञानिक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भाग लिया।
इस अवसर पर आईजीएसटीसी की निदेशक डॉ. कुसुमिता अरोड़ा ने कहा कि यह सम्मेलन सरकार, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच संवाद का मंच है। उन्होंने बताया कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में इन तीन स्तंभों के सहयोग से शोध को वास्तविक समाधान में बदला जा सकता है। उनका मानना है कि अनसुलझी तकनीकी चुनौतियों का समाधान मिलकर ही निकाला जा सकता है।
इस अवसर पर सर्जन वाइस एडमिरल डॉ. आरती सरीन, डीजीएएफएमएस, ने सशस्त्र बल मेडिकल सेवाओं में टेलीमेडिसिन की भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि टेलीहेल्थ आज सशस्त्र बलों की स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है और यह करीब 1.6 करोड़ सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को अपनी सेवा प्रदान कर रहा है।
उन्होंने बताया कि शुरुआत में यह केवल ऑनलाइन परामर्श तक सीमित था, लेकिन अब उपग्रह आधारित प्लेटफॉर्म के जरिए समुद्री तैनाती और दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में भी चिकित्सा सुविधा दी जा रही है। उन्होंने सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड (कूटबद्ध) संचार प्रणाली, वियरेबल हेल्थ डिवाइस (ऐसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हैं जिन्हें शरीर पर पहना जा सकता है) और एआई आधारित जांच प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया।
बीआईआरएसी के प्रबंध निदेशक डॉ. जितेन्द्र कुमार ने कहा कि डिजिटल स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में बायोटेक्नोलॉजी (जैव प्रौद्योगिकी) की अहम भूमिका है। उन्होंने स्टार्टअप और नवाचारकर्ताओं को सहयोग देने की आवश्यकता बताई, ताकि डायग्नोस्टिक्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में नये समाधान विकसित किए जा सकें। उन्होंने कहा कि प्रतिभा पलायन रोकने के लिए वित्तीय सहायता, मार्गदर्शन और सरल नियामक व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने भारत-जर्मनी साझेदारी को वैश्विक मानकों के अनुरूप समाधान विकसित करने में उपयोगी बताया।
वहीं स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. सुनीता शर्मा ने राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के तहत टेलीमेडिसिन सेवाओं के विस्तार पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अब टेलीमेडिसिन सेवाएं आयुष्मान मंदिर स्तर तक पहुंच चुकी हैं, जिससे ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवायें सुलभ हो रही हैं। उन्होंने तपेदिक उन्मूलन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में कृत्रिम बौद्धिकता, मशीन लर्निंग (मशीन द्वारा सीखना) और पॉइंट-ऑफ-केयर (देखभाल के बिंदु) तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। साथ ही आंकड़ों की सुरक्षा और मजबूत नियामक प्रणाली की आवश्यकता भी बताई।
मेडिकल टेक्नोलॉजी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन पवन चौधरी ने उद्योग की अपेक्षाओं को सामने रखते हुए कहा कि अनुसंधान को व्यवहारिक उत्पादों में बदलने के लिए प्रोत्साहन और सहयोगी नीतियां आवश्यक हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के डॉ. अरिंदम भट्टाचार्य ने कहा कि टेलीमेडिसिन और मोबाइल हेल्थ तकनीक को पायलट स्तर से आगे बढ़ाकर बड़े स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।
उन्होंने अकादमिक संस्थानों, स्टार्टअप और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी की वकालत की, ताकि दूर-दराज के क्षेत्रों तक आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा सकें। सम्मेलन में एआई आधारित डायग्नोस्टिक्स, रिमोट पेशेंट मॉनिटरिंग, वियरेबल उपकरण और चिप आधारित प्रयोगशाला सेवाओं पर चर्चा हुयी। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि मोबाइल हेल्थ और टेलीमेडिसिन भारत की भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ बनेंगे।



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