KDMC Election: बिना विरोध चुने गए उम्मीदवारों पर 6 साल की रोक? 20 लोगों का क्या होगा

Sun, Jan 04 , 2026, 11:19 AM

Source : Hamara Mahanagar Desk

कल्याण-डोंबिवली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (Kalyan-Dombivli Municipal Corporation) के पॉलिटिकल एरिया में इस समय ज़बरदस्त हलचल है। BJP और शिवसेना दावा कर रही हैं कि महायुति के 20 उम्मीदवार बिना विरोध चुने गए। फिर भी, सोशल एक्टिविस्ट और विपक्षी पार्टियों ने इस प्रोसेस को डेमोक्रेसी का मर्डर बताया है और सीधे कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की चेतावनी दी है। जब NOTA (नन ऑफ़ द एबव) वोटर्स का कॉन्स्टिट्यूशनल राइट है, तो इसके बिना जीत का ऐलान कैसे होता है?

असल में क्या है विवाद?

इलेक्शन रूल्स के मुताबिक, अगर किसी वार्ड में सिर्फ़ एक उम्मीदवार होता है, तो उसे बिना विरोध जीता हुआ घोषित कर दिया जाता है। हालांकि, इस प्रोसेस में EVM मशीनों पर NOTA के ऑप्शन पर विचार नहीं किया जाता। RTI एक्टिविस्ट श्रीनिवास घनेकर (RTI activist Srinivas Ghanekar) के दावे के मुताबिक, NOTA भी एक टेक्निकल कैंडिडेट है। अगर वोटर्स उस एक उम्मीदवार को रिजेक्ट करना चाहते हैं, तो उनके पास NOTA का ऑप्शन होना चाहिए। श्रीनिवास घनेकर ने मांग की है कि अगर NOTA को मिले वोट कैंडिडेट से ज़्यादा हैं, तो चुनाव कैंसिल करके दोबारा कराना ज़रूरी होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपने 2013 के फैसले में वोटर्स को NOTA का अधिकार दिया है। ऐसे में बिना वोटिंग के सीधे जीत की घोषणा करने का मतलब है वोटर्स को उनके रिजेक्ट करने के अधिकार से वंचित करना, श्रीनिवास घनेकर ने यह भी कहा है।

शिवसेना ठाकरे ग्रुप के ज़िला प्रमुख अल्पेश भोईर (Alpesh Bhoir) ने कहा है कि इस बिना विरोध के प्रक्रिया के पीछे भारी पैसे का लेन-देन और दबाव है। उन्हें विरोधियों की एप्लीकेशन वापस लेने की धमकी दी गई है। कई तरह के लालच भी दिए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि विरोधियों को करीब 50 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक का ऑफ़र दिया गया है।

हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी
मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट पीरियड और ऑफिशियल चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक किसी को भी खुद को विजेता घोषित करने का कानूनी अधिकार नहीं है। इसलिए, ठाकरे ग्रुप अब इस प्रक्रिया के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहा है।

इलेक्शन कमीशन के मौजूदा नियमों (RP एक्ट के सेक्शन 53(2) के मुताबिक, अगर सिर्फ़ एक कैंडिडेट हो, तो वोटिंग नहीं होती। हालांकि, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विचार करना शुरू किया है कि क्या बिना मुकाबले वाले चुनावों में भी वोटर्स को अपनी नापसंदगी (NOTA) दिखाने का मौका मिलना चाहिए। अगर कोर्ट इस मामले में दखल देता है, तो KDMC के ये 20 नतीजे खतरे में पड़ सकते हैं।

क्या विजयाचा गुलाल NOTA के कानूनी जाल में फंस जाएगा?

अगर यह विवाद कोर्ट में चलता है और कोर्ट वोटिंग का आदेश देता है, तो एडमिनिस्ट्रेशन को उन वार्ड्स में फिर से वोटिंग का इंतज़ाम करना होगा। साथ ही, अगर NOTA को सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं, तो संबंधित कैंडिडेट को छह साल के लिए चुनाव लड़ने से बैन करने की मांग भी ज़ोर पकड़ सकती है। इसलिए, यह देखना ज़रूरी होगा कि कल्याण डोंबिवली के 20 वार्ड्स में विजयाचा गुलाल NOTA के कानूनी जाल में फंसता है या नहीं।

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