रांची: झारखंड की सांस्कृतिक और पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए नाबार्ड झारखंड ने जीआई टैगिंग की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। अब तक राज्य में केवल सोहराई पेंटिंग को ही जीआई टैग प्राप्त है, लेकिन इस वर्ष नाबार्ड ने झारखंड के नौ अनोखे और विशेष उत्पादों के लिए जीआई टैगिंग का आवेदन किया है। इस प्रयास का मकसद स्थानीय कारीगरों और किसानों को आर्थिक मजबूती प्रदान करना और राज्य की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है।
नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष के अनुसार, यह नौ उत्पाद हैं: देवघर का प्रसिद्ध अट्ठे मटन, जो शुद्ध घी में पकाने की अपनी विशिष्टता के कारण मशहूर है, और सरायकेला-खरसावां की उच्च करक्यूमिन वाली खास हल्दी, जो अपनी चमकदार रंग और खुशबू के लिए जानी जाती है। इसके अलावा, सिमडेगा के बीरू गमछा, कुचाई के टसर सिल्क से बनी सिल्क साड़ियां, गोड्डा की प्रीमियम तसर सिल्क साड़ियां, सिमडेगा की मीठी इमली, रांची की आदिवासी ज्वेलरी, कुशल बांस कारीगरों के द्वारा बनाए गए घरेलू और सजावटी बांस के सामान, और खूंटी जिले में बनी करणी शॉल भी इस सूची में शामिल हैं।
जीआई टैग मिलने पर इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जो उनकी नकल से रक्षा करेगा और इनके ब्रांड मान्यता को बढ़ाएगा। इससे न केवल उत्पादों की मांग बढ़ेगी बल्कि झारखंड के किसान, कारीगर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ होगा। अट्ठे मटन जैसे उत्पादों का स्वाद और गुणवत्ता विदेशों तक पहुंच चुकी है, जिसे जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान और अवसर मिलेंगे। नाबार्ड की इस पहल से झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण उत्पादों को मजबूती मिलेगी, आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका में सुधार होगा। इस प्रक्रिया में आवश्यक सभी दस्तावेज केंद्रीय एजेंसी को सौंप दिए गए हैं और अब अंतिम मंजूरी का इंतजार है।



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