Heart Disease in Women: महिलाओं के लिए खतरे की घंटी… दो साल में दिल से जुड़ी बीमारियों में 20 परसेंट की बढ़ोतरी; असली वजह क्या है?

Thu, Mar 05 , 2026, 08:23 PM

Source : Hamara Mahanagar Desk

Women Heart Health: दिल से जुड़ी परेशानियां दुनिया भर में मौत का सबसे बड़ा कारण हैं। हर साल लाखों लोग दिल की बीमारियों (heart disease) की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। अब तक माना जाता था कि एस्ट्रोजन महिलाओं के शरीर में बनने वाला एक हार्मोन है, जो उनके दिल के चारों ओर एक ढाल की तरह काम करता है। इससे महिलाओं में दिल से जुड़ी परेशानियां कम होती हैं। अब महिलाओं की यह ढाल टूट रही है। मुंबई के सायन हॉस्पिटल (Sion Hospital) के नए डेटा के मुताबिक, पिछले दो सालों में दिल की बीमारी से पीड़ित महिलाओं की संख्या में 20 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है। पहले माना जाता था कि दिल की बीमारी बुढ़ापे में होती है, लेकिन अब 20 से 40 साल की कम उम्र की महिलाएं भी हॉस्पिटल में भर्ती हो रही हैं। हालांकि सबसे ज़्यादा खतरा 50 से 60 साल की महिलाओं में देखा जाता है, लेकिन कम उम्र की महिलाओं की सर्जरी चिंता की बात है।

रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई के सायन हॉस्पिटल के डेटा के मुताबिक, पिछले 2 सालों में महिलाओं में दिल की बीमारी के प्रोसीजर में करीब 20% की बढ़ोतरी हुई है। आसान शब्दों में कहें तो, जब दिल की आर्टरीज़ में ब्लॉकेज होता है या दिल ठीक से काम नहीं कर रहा होता है, तो डॉक्टर उसे ठीक करने के लिए ऑपरेशन या रिपेयर करते हैं। इसे कार्डियक प्रोसीजर कहते हैं। इसमें एंजियोप्लास्टी, स्टेंट प्लेसमेंट या पेसमेकर इम्प्लांटेशन जैसे प्रोसीजर शामिल हैं। यह इस बात का साफ संकेत है कि महिलाओं की नेचुरल डिफेंस कमजोर हो रही है और वे पहले से ज्यादा हार्ट अटैक के लिए सेंसिटिव हो रही हैं।

सायन हॉस्पिटल के डेटा के मुताबिक, महिलाओं में हार्ट अटैक प्रोसीजर की संख्या 2023 में 742 से बढ़कर 2025 में 884 हो गई है। सबसे खास बात यह है कि हार्ट अटैक अब सिर्फ बड़ी उम्र की महिलाओं तक ही सीमित नहीं हैं। 20 से 40 साल की युवा महिलाएं भी हार्ट से जुड़े ट्रीटमेंट करवा रही हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा प्रभावित एज ग्रुप 50 से 60 साल का है। कुल प्रोसीजर में से लगभग 20% कोरोनरी एंजियोप्लास्टी थे, जो सीधे हार्ट अटैक से जुड़े हैं। इस बदलते पैटर्न ने यह साफ कर दिया है कि अब कोई भी एज ग्रुप या जेंडर सेफ नहीं है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हॉस्पिटल आने वाली ज़्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं होता कि उन्हें हार्ट अटैक आया है। अक्सर महिलाएं अपनी हेल्थ को नज़रअंदाज़ करती हैं और अपनी ज़िम्मेदारियों में लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। इससे इलाज में देरी होती है। महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों की तरह सिर्फ़ तेज़ सीने में दर्द तक ही सीमित नहीं होते। महिलाओं को सीने में जलन, थकान, पीठ दर्द, पेट दर्द, जबड़े या गर्दन में दर्द, जी मिचलाना, फ्लू जैसे लक्षण और यहां तक ​​कि एंग्जायटी भी हो सकती है। इन लक्षणों को अक्सर सीने में जलन या आम कमज़ोरी समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी होती है और हालत और बिगड़ जाती है।

डॉक्टरों के मुताबिक, महिलाओं में दिल की बीमारी के सबसे बड़े कारण डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर और तंबाकू का इस्तेमाल हैं। इसके अलावा, स्ट्रेस भी एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। लगभग 16% दिल की बीमारी के मामलों में स्ट्रेस एक बड़ी वजह बनकर सामने आया है। एयर पॉल्यूशन जैसे बाहरी कारणों को भी दिल से जुड़ी समस्याओं से जोड़ा जा रहा है। महिलाओं को सीने में जलन या सांस लेने में तकलीफ़ के लक्षणों को भी गंभीरता से लेना चाहिए। समय पर हेल्थ चेक-अप, स्ट्रेस मैनेजमेंट और लाइफस्टाइल में बदलाव ही इस बढ़ती परेशानी से बचने का एकमात्र तरीका है। पिछले कुछ सालों में महिलाओं में दिल की बीमारी बढ़ी है, और इसके कई बायोलॉजिकल, सोशल और लाइफस्टाइल से जुड़े कारण हैं। पहले दिल की बीमारी पुरुषों में ज़्यादा आम मानी जाती थी, लेकिन आजकल यह महिलाओं में भी बढ़ रही है। इसके पीछे एक मुख्य कारण लाइफस्टाइल में बदलाव है। शहर की ज़िंदगी, काम का स्ट्रेस, ठीक से आराम न मिलना, अनियमित डाइट, ज़्यादा ऑयली और प्रोसेस्ड खाना, और एक्सरसाइज़ की कमी, ये सभी दिल की सेहत को नुकसान पहुँचाते हैं।

बायोलॉजिकल नज़रिए से देखें तो महिलाओं में हॉर्मोन अहम भूमिका निभाते हैं। प्रेग्नेंसी, पीरियड्स में बदलाव और मेनोपॉज़ के बाद एस्ट्रोजन लेवल में कमी से दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। एस्ट्रोजन के प्रोटेक्टिव गुणों में कमी से ब्लड प्रेशर और खून की नसों में कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ सकता है, जिससे एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों में फैट जमा होना) का खतरा बढ़ जाता है। सोशल और साइकोलॉजिकल स्ट्रेस भी एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। महिलाओं को परिवार, काम और सोशल ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए ज़्यादा स्ट्रेस सहना पड़ता है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित दिल की धड़कन और स्ट्रेस हॉर्मोन का लेवल बढ़ जाता है। वहीं, कुछ स्टडीज़ बताती हैं कि महिलाओं में दिल की बीमारी के लक्षण पुरुषों की तुलना में अलग या हल्के होते हैं, जैसे थकान, सिरदर्द या पेट दर्द, जिससे डायग्नोसिस में देरी होती है। कुल मिलाकर, मॉडर्न लाइफस्टाइल, हार्मोनल बदलाव और मेंटल स्ट्रेस, ये तीन वजहें हैं जो महिलाओं में दिल की बीमारी बढ़ने के लिए ज़िम्मेदार हैं। सही डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज, स्ट्रेस मैनेजमेंट और समय पर मेडिकल चेक-अप जैसे तरीकों से इस खतरे को कम किया जा सकता है। महिलाओं को अपने दिल की सेहत पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि हल्के लक्षणों के भी गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

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